Domestic Violence /Female Harassment
घरेलू हिंसा : घरेलू हिंसा, एक अत्यन्त गम्भीर और विषम समस्या, अब समाज के प्रत्येक स्तर में गहरे समायी हुई है, जो केवल एक व्यक्तिगत अधिकार का उल्लंघन नहीं, अपितु समग्र सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों का भी अपमान है। यह हिंसा तब प्रकट होती है जब एक व्यक्ति अपनी प्रभुत्ववादी मानसिकता से सम्बन्धों में वर्चस्व स्थापित करने हेतु शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक उत्पीड़न की ओर अग्रसर होता है। यह सामाजिक विकृति अब नये रूपों में, जैसे ‘लव जिहाद’ और ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में प्रकट हो रही है, जिससे महिला उत्पीड़न के नये पहलू उभरते हैं। सरकार द्वारा घरेलू हिंसा के खिलाफ कई विधिक कदम उठाए गए हैं, जैसे भारतीय दंड संहिता (IPC), घरेलू हिंसा (संरक्षण) अधिनियम, 2005, और महिला सुरक्षा प्रभाग। परन्तु प्रश्न यह है कि क्या इन विधिक उपायों से समाज में वास्तविक परिवर्तन हो रहा है या वे केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह गए हैं? क्या यह प्रयास समाज में व्याप्त हिंसा और असुरक्षा की समस्याओं का समाधान कर पा रहे हैं, या यह केवल एक बाहरी आच्छादन के रूप में सीमित हैं? यह गम्भीर प्रश्न है, जिसका उत्तर समग्र समाज और सत्ता तंत्र को स्वयं से पूछने की आवश्यकता है। घरेलू हिंसा की घटनाएँ अब ऐसी विकट स्थिति में पहुँच चुकी हैं कि समाज में रोज़ घटने वाली ये घटनाएँ पुलिस थानों में दर्ज नहीं होतीं, क्योंकि पुलिसकर्मी इनसे मुँह मोड़कर अपनी छवि सुधारने में लिप्त रहते हैं। जब पीड़ित मदद के लिए थाने पहुँचता है, तो पुलिस का अधिकारिक रौब उसे हतोत्साहित करता है। इस तरह, समाज में पीड़ितों का न्याय से मोहभंग हो जाता है और वे थाने में प्राथमिकी दर्ज नहीं करवा पाते। दुर्भाग्यवश, आजकल अधिकांश एनजीओ और समाजसेवी पीड़ितों से केवल वसूली के कृत्य में संलिप्त हैं, जिससे पीड़ित फिर से वही पीड़ा और यातना का सामना करते हैं। न्यायालयों में न्याय की प्राप्ति एक असम्भव स्वप्न सा प्रतीत होती है, जैसे शाह बानो, निर्भया और अन्य घटनाओं में न्याय की तलाश ने पीड़ितों को दशकों तक निराश किया है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि जब लाखों निर्दोषों के साथ वीभत्स अपराध होते हैं, तो वे कहाँ जाएँ? 2012 के NCRB आँकड़े भी अपराधों की बढ़ती दर की पुष्टि करते हैं, जो समाज और कानूनी व्यवस्था के बीच एक गहरी खाई की तरह खड़ी हैं। सरकारी आँकड़ों में इसे तुच्छ और नगण्य रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि इस प्रकार की घटनाओं पर मीडिया में प्रकाशन अत्यन्त विरल है। बहुसंख्यक मीडिया माध्यम इन समस्याओं की उपेक्षा करते हैं या उन्हें बौद्धिक दृष्टि से तुच्छ मानते हैं। इसके परिणामस्वरूप, लाखों पीड़ित न्याय और राहत की तलाश में निरन्तर दर-दर भटकते हैं और उनकी पीड़ा कभी किसी सम्वेदनशील कानों तक नहीं पहुँच पाती। घरेलू हिंसा, जो कभी रात्रि के घोर तिमिर में कर्कश और विकृत ध्वनियों में व्यक्त होती है, अक्सर सूक्ष्म रूप से दब जाती है। यह दृश्य और अदृश्य पीड़ा कहीं अधिक यातनामूलक होती है। क्या ऐसी हिंसा की एफआईआर दर्ज हो सकती है? यद्यपि यह कागजों पर दर्ज हो सकती है, परन्तु यह एक काल्पनिक भ्रम से अधिक कुछ नहीं प्रतीत होती। जैसा कि ‘मि. इंडिया’ फिल्म में दिखाया गया है, जब नायक घड़ी के माध्यम से अदृश्य हो जाता है, वैसे ही घरेलू हिंसा की शिकायत भी पुलिस के समक्ष अदृश्य हो जाती है। कभी-कभी, शिकायतकर्ता भी इस अदृश्यता का शिकार हो जाता है। इस प्रकार, पुलिस अपने कार्य की श्रेष्ठता का भ्रम पालती है और उसे अत्यधिक सरल समझने का आभास उत्पन्न करती है। हमारे सामाजिक ताने-बाने में, पाँच में से चार महिलाएँ और दस में से एक पुरुष घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं। यह हिंसा उनके जीवन में एक स्थायी अभिशाप बनकर उनका पीछा करती है, जिससे वे जीवनभर पीड़ित रहते हैं, बिना किसी सहारा या सान्त्वना के। प्रायः पुरुष महिला के रूप-सौन्दर्य में सम्मोहित होकर एक आदर्श सम्बन्ध की कल्पना करते हैं, किन्तु इस आकर्षण के पीछे छिपी उनकी वास्तविक आकांक्षा अधिक अंतरंगता प्राप्त करने की होती है। जब यह सम्बन्ध यौन सम्बद्धता में बदलते हैं, तो कई बार हिंसा का बीज समाहित हो जाता है, जो धीरे-धीरे विस्फोटक रूप धारण कर सम्बन्ध को नष्ट कर देता है। इस हिंसा में संलिप्त व्यक्ति पीड़ित की मानसिक और शारीरिक दुर्बलता का लाभ उठाता है और पीड़ित उसे सहन करने का प्रयास करता रहता है, जिससे दोनों का मानसिक और शारीरिक विकास बाधित होता है। समाज में ऐसे कई कुटिल तत्त्व हैं, जो पुरुष और महिला के बीच खाई उत्पन्न करने के लिए साजिशें करते हैं और यह प्रायः महिलाओं को ही नुकसान पहुँचाती हैं। पुरुष की आवश्यकताओं को महिला की अपेक्षाओं से उच्च स्थान देना समाज की एक दोषपूर्ण परम्परा है। यदि समाज में पुरुष और महिला को समान अवसर मिलें, तो घरेलू हिंसा में स्वाभाविक रूप से कमी आ जायेगी। घरेलू हिंसा से न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक नुकसान भी होता है। जब यह हिंसा अपराध के रूप में रूपान्तरित होती है, तब वह शारीरिक हानि का कारण बनती है। किन्तु, इस हिंसा का जो सूक्ष्म और अदृश्य प्रभाव मानसिक और बौद्धिक संरचनाओं पर पड़ता है, वह न केवल देखने में अपितु अनुभव करने में भी अत्यन्त कठिन और असहनीय होता है। यह पीड़ा निरन्तर मस्तिष्क और आत्मा के भीतर गूँजती रहती है, जिससे उत्पन्न होने वाली कराहें कभी बाह्य रूप से सुनाई नहीं देतीं। इस अभूतपूर्व और अव्यक्त वेदना का कोई चिकित्सीय उपचार भी उपलब्ध नहीं है। तो क्या इस अपरिहार्य दुःख और पीड़ा के लिए किसी व्यक्ति को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है? जो महिलाएँ बचपन से ही हिंसा और अपमान का शिकार होती हैं, उनके लिए पुरुषों के साथ स्वस्थ रिश्ते स्थापित करना और उसमें शान्ति लाना अत्यन्त कठिन हो जाता है। समाज में सुसंस्कृत और शाश्वत परिवर्तन के लिए केवल सतही सुधार अपर्याप्त हैं; आवश्यकता है गहन एवं समग्र परिवर्तन की, जो विद्यालयों से आरम्भ होकर परिवारों में पल्लवित हो, जहाँ नैतिक शिक्षा का प्रवाह हो। इस सामाजिक नवजागरण में महिला सशक्तिकरण तथा हिंसा विरोधी पहलों को अभिन्न अंग बनाना अनिवार्य है। सामाजिक संगठनों, गैर सरकारी संस्थाओं और सोशल मीडिया को इस सांस्कृतिक परिवर्तन के प्रवर्तक रूप में सम्मिलित किया जाना चाहिए। घरेलू हिंसा का स्वरूप भय के आन्तरिक द्वन्द्व से जुड़ा हुआ है, जिसे सकारात्मक और नकारात्मक प्रकारों में विभक्त कर समझा जाना चाहिए। नकारात्मक भय जीवन के प्रवाह को नष्ट करता है, जबकि सकारात्मक भय जागरूकता और सम्वेदनशीलता को अभिवृद्धि कर, जीवन को उत्कर्ष की ओर प्रेरित करता है।














