Women Empowerment

- महिला सशक्तीकरण – वर्तमान युग में महिला सशक्तीकरण एक अनिवार्य विमर्श बन चुका है। हमारे प्राचीनतम ग्रन्थों में नारी के प्रति उच्च सम्मान का उद्घाटन किया गया है, “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।” तथापि, इस महिमा के बावजूद, महिला सशक्तीकरण की आवश्यकता तीव्रता से अनुभव की जा रही है। आर्थिक स्वतंत्रता ही उनकी सामाजिक उन्नति का माध्यम बन सकती है, जिसमें सम्पत्ति, आय और निर्णय लेने की क्षमता प्रमुख है। स्त्री, जो सृजन शक्ति का प्रतीक है, मानवता के अस्तित्व का अडिग स्तम्भ है। उसका सशक्तीकरण सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु, समता और अवसरों की समानता में समाहित है। यह प्रक्रिया नारी को अपने अधिकारों और आकांक्षाओं के प्रति जागरूक कर, उसे निर्णय लेने में सक्षम बनाती है, ताकि वह समाज में समानता और स्वतंत्रता के साथ अस्तित्व में प्रतिष्ठित हो सके। महिला सशक्तीकरण की आवश्यकता समाजिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में अनिवार्य हो चुकी है। मध्यकाल में भारतीय महिलाओं का सम्मान ह्रासित हुआ और आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में वे सामाजिक-आर्थिक असमानताओं का सामना कर रही हैं। शहरी महिलाएँ प्रशासनिक भूमिकाओं में सक्रिय होते हुए भी, ग्रामीण महिलाएँ शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों से वंचित हैं। पुरुषों के समकक्ष समान योग्यताओं के बावजूद उन्हें कम वेतन मिलता है, जिससे लैंगिक असमानता बनी रहती है। भारत की आधी आबादी का सशक्तीकरण न होने के कारण देश का समग्र विकास रुक जाता है। महिला उत्पीड़न और भेदभाव एक दीर्घकालिक समस्या है और सामाजिक संरचनाएँ इसे बढ़ावा देती हैं। सरकार द्वारा स्थापित कानूनी प्रावधानों के बावजूद वास्तविक परिवर्तन हेतु सामाजिक जागरूकता और संगठनों के सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। महिला अधिकारों के प्रति सजगता और संघर्ष के बावजूद समाज में इसका अपराधिक पक्ष भी विद्यमान है।भारतीय समाज एक गहरे सांस्कृतिक और पारम्परिक ताने-बाने में बसा हुआ है, जिसमें निहित रुढ़िवादी दृष्टिकोण और आदर्शों ने महिलाओं के सशक्तीकरण में विघ्न डाले हैं। इन अवरोधों में से कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हैं: पुरानी परम्पराओं के कारण महिलाओं के घर से बाहर जाने पर रोक और शिक्षा या रोजगार से वंचित होना। यह परिधि महिला आत्म-स्वीकृति और सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण में विफलता का कारण बनती है। कार्यक्षेत्र में शोषण और लैंगिक भेदभाव की स्थितियाँ, विशेषकर निजी क्षेत्र में, महिला सशक्तीकरण की यात्रा में प्रमुख बाधाएँ हैं। पुरुष प्रभुत्व का वर्चस्व महिलाओं को कई स्तरों पर संकुचित करता है, जैसा कि कार्यस्थल में उत्पीड़न के बढ़ते आँकड़े प्रदर्शित करते हैं। महिलाओं को समान कार्य के लिए पुरुषों से कम वेतन मिलना और असंगठित क्षेत्रों में यह स्थिति अधिक विकट है। अशिक्षा और शिक्षा के मार्ग में रुकावटें, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, महिलाओं के समग्र विकास में अवरोध उत्पन्न करती हैं। बाल विवाह जैसी कुरीतियाँ और कन्या भ्रूणहत्या जैसी घातक प्रवृतियाँ भी महिला सशक्तीकरण में गहरी खाई खोदती हैं। भारत सरकार ने महिला सशक्तीकरण हेतु विविध योजनाओं का प्रारम्भ किया है, जिनमें रोजगार, कृषि और स्वास्थ्य जैसे पहलुओं का समावेश है। ये योजनाएँ भारतीय महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार हेतु हैं, ताकि उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। प्रमुख योजनाओं में मनरेगा, सर्व शिक्षा अभियान और जननी सुरक्षा योजना प्रमुख हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा संचालित योजनाएँ महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अवसरों में समानता प्रदान करने के लिए प्रयासरत हैं। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” यह अभियान कन्या भ्रूण हत्या और शिक्षा के प्रसार हेतु है।
- “महिला हेल्पलाइन” महिलाओं को 24 घंटे आपातकालीन सहायता प्रदान करती है। “उज्जवला योजना” महिलाओं को तस्करी और यौन शोषण से बचाने के लिए है। ‘स्टेप’ योजना, महिला कौशल विकास एवं रोजगार सृजन की दिशा में कार्यरत है, जबकि ‘महिला शक्ति केन्द्र’ ग्रामीण महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाती है। 2009 में पंचायती राज संस्थानों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण की घोषणा ने उनकी सामाजिक स्थिति को सुदृढ़ किया है। समीपवर्ती काल में नारी ने उच्चतम शिक्षण एवं साक्षरता प्राप्त कर स्वतंत्रता की नई परिभाषा गढ़ी है। वह अपने अधिकारों के प्रति सतर्क एवं स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम हुई है। चारदीवारी से बाहर निकलकर राष्ट्र के निर्माण में सक्रिय योगदान दी है। महिलाएँ हमारे देश की प्रजाति का अर्धांग हैं और राष्ट्र की प्रगति में उनके योगदान के बिना कोई सम्पूर्ण विकास सम्भव नहीं है। भारतीय समाज में अनेक उदाहरण हैं, जो नारी सशक्तीकरण की जीवन्त छवियाँ हैं। महिला सशक्तीकरण ने स्त्रियों के जीवन में समग्र परिवर्तनों की धारा प्रवाहित की है। महिलाएँ अब न केवल प्रत्येक क्षेत्र में सहभागिता बढ़ा चुकी हैं, अपितु अपनी नियति के निर्णय भी स्वयं लेने में सक्षम हो चुकी हैं। आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर होती ये महिलाएँ, अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं और इस क्रम में पुरुषों से समानता की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुकी हैं। पुरुषों का दृष्टिकोण भी परिवर्तनशील हुआ है। वे अब स्त्रियों के अधिकारों की स्वीकृति देने तथा उनके निर्णयों का सम्मान करने लगे हैं। यह सत्य है कि अधिकार केवल मांगे नहीं जाते, वे संघर्ष और सामूहिकता से ही प्राप्त होते हैं। अब नारी ने रूढ़िवादी दायित्वों को चुनौती देना प्रारम्भ कर दिया है। यह परिवर्तन निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, किन्तु इसे और भी प्रगति की आवश्यकता है। समाज की समग्र प्रगति केवल तभी सम्भव है, जब नारी के सर्वांगीण उत्कर्ष हेतु यथासम्भव प्रोत्साहन एवं कृत्य किए जाएं। नारी की सशक्तता को समाज के प्रत्येक क्षेत्र में समुचित रूप से प्रोत्साहित करना अत्यावश्यक है। इस संस्था का उद्देश्य महिलाओं को पुरुषों के समान सशक्त, सक्षम और सबल बनाना है, ताकि वे अपने बलबूते पर आत्मनिर्भरता को प्राप्त कर सकें। समाज के अंधकारमय कोने में स्थित अशिक्षित लड़कियों और महिलाओं को साक्षर तथा आत्मनिर्भर बनाना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कर्तव्य है। इस हेतु, संस्था विभिन्न प्रशिक्षणों के माध्यम से महिलाओं को कढ़ाई, सिलाई, बुनाई आदि कौशलों में पारंगत करती है, जिससे उन्हें सशक्त जीवन जीने की राह मिल सके। जिला, अनुमण्डल, प्रखण्ड तथा ग्राम पंचायत स्तर पर प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना कर योग्य प्रशिक्षकों के द्वारा महिलाओं एवं युवतियों को न केवल व्यावसायिक, अपितु आत्मनिर्भरता की दिशा में भी प्रशिक्षित किया जाता है। इस प्रकार के प्रशिक्षण से महिलाएं आत्मनिर्भर बनकर, समाज में अपनी पहचान स्थापित करने में सक्षम होती हैं तथा समाज के विकास की मुख्यधारा से जुड़कर उन्नति की ओर अग्रसर होती हैं। इस संस्था ने महिला सशक्तिकरण के अन्तर्गत हजारों महिलाओं को न केवल योग्य बल्कि हुनरमंद भी बना दिया है। इच्छुक व्यक्ति उक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए संस्था से सम्पर्क कर सकते हैं अथवा संस्था के कार्यालय में आकर अपनी मंशा व्यक्त कर सकते हैं।











